आखिर पलायन कर जाता है.… अंकित

उमीदें बांध कर जब वो 
छोड़ अपना गांव आता इस जहाँ में 
अपना सब कुछ कुर्बान कर 
कोई मंजिल भी पाता नही इस जहां में 
आखिर पलायन कर ही जाता है….
पसीने की आखिरी बून्द बहा कर 
हर रोज एक नव नीव निर्माण करता है वो 
ख्वाइंशे तो पूर्ण हो ना पाती 
चूल्हे से हर रोज घुआ उठे 
उतना ही कमा पाता है वो, तो क्या करे 
पलायन कर ही जाता है वो…..
कभी बैठ अगर अकेले तो 
अपनी किस्मत को ही दोष लगाता है 
ऐसा क्या कर्म किया था मैने 
जो खुदा इतना गरीब बनाया है। 
ऐसे अनेकों अनाप-शनाप सवाल 
अपने मन में ही गुनगुनाता है। 
क्या करे बिचारा हार कर 
आखिर पलायन कर जाता है.…..।।
 
 
अंकित कुशवाहा
गाज़ीपुर (उत्तर – प्रदेश)

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