एडजस्टमेंट की उम्मीद सिर्फ लड़कियों से ही क्यों ..कुमारी किर्ती अमृता आशा

आये  भले ही उसको नंबर  कम,
तुम हो जाओ जिला टॉपर
पर फर्क नहीं पड़ता
क्यूंकि तुम लड़की  हो,

स्कूल से घर आते वक़्त
अनजाना डर,
कॉलेज पहुंच  गयी
जॉब भी लग गयी
ना गया फिर  भी ये अनजाना डर..
इस डर के साथ एडजस्टमेंट करना सीखो..
क्यूंकि तुम लड़की हो…

शादी  से पहले घर वालो की सुनो,
शादी के बाद ससुराल वालो की सुनो,
पति ने दो थप्पड़ मार दिए तो क्या हुआ
तुम्हे एडजस्ट करना होगा
क्यूंकि तुम लड़की  हो…

आते हो तुमको जुडो कराटे या
आता हो तुमको कम्प्यूटर चलाना..
भले ही वो बैठा हो बेरोज़गार और  तुम कमा कर खिलाओ,
फिर भी ऑफिस से आ कर
करने होंगे घर के सारे  काम,
पर करने होंगे एडजस्टमेंट बस तुमको ही..,
क्यूंकि तुम लड़की  हो..

बन जाओ कलेक्टर, डॉक्टर या इंजीनियर,
फिर भी आएगी एडजस्टमेंट तुम्हारे ही हिस्से मे,
 क्यूंकि तुम लड़की  हो..

एडजस्टमेंट मे जिंदगी है
या जिंदगी मे एडजस्टमेंट..

समझ  नहीं आ रहा लड़की हु !
 या हु बस  कोई एडजस्टमेंट,
जो हर बात पे बस एडजस्टमेंट
एडजस्टमेंट  और बस एडजस्टमेंट..!!

कुमारी किर्ती अमृता आशा,
जमालपुर(मुंगेर )
बिहार

4 thoughts on “एडजस्टमेंट की उम्मीद सिर्फ लड़कियों से ही क्यों ..कुमारी किर्ती अमृता आशा”

  1. आपकी कविता बहुत अच्छी है लेकिन धीरे – धीरे सब बदल रहा है । अब बेटियां भी बेटों से कंधा से कंधा मिला कर चल रही । 😊

  2. So nice poetry dear 😊😊 but according to time changes are also come ….but yeah adjustment are always happened in not only for one but in today both …..best wishes for your poetry dear ♥️♥️well done ….

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