कविता लालच … कुछ ज़्यादा पाने की चाहत…

कुछ  ज़्यादा  पाने की चाहत
कब लालच मे बदल जाती है
कहाँ पता चलता है…
खूबसूरत तन के लालच  मे अक्सर 
खूबसूरत मन ख़ो  देते है लोग,
जब तक ठोंकर लगे ना खुद को
तब तक सच्चे  रिश्तों का कहाँ पता चलता है…
थोड़ा और थोड़ा और के लालच मे,
कब बर्बादी दौर शुरू  हो जाता है
कहाँ पता चलता है…..
नजर आते सब कुछ सुनहरे 
इस लालच के जंजाल मे,
लालच की आदत कब लत बन जाती है 
कहाँ पता चलता है..
कभी पैसों के तो कभी 
झूठे रिश्तो के लालच मे,
इंसान कब हद्द से गुज़र  जाता है
कहाँ पता चलता है…
 डूबा ले जाती है अपने संग लालच 
हर सच्चे रिश्तो को 
सुनहरे  अवसरो को,.
बेहतर कल को..
जब तक होती है अपने लालच  की ख़बर,
तब तक  इतनी देर  हो जाती है, 
की फिर  कोई साथ कहाँ खड़ा  होता है…
बेमौत ही मौत दे देती है ये लालच 
पर तब भी मरने से पहले तक
आहिस्ते आहिस्ते आती अपनी मौत की 
सैर का कहाँ पता होता है..
कुमारी किर्ती अमृता आशा 
        मुंगेर   बिहार

4 thoughts on “कविता लालच … कुछ ज़्यादा पाने की चाहत…”

  1. आपकी कविता बहुत ही अच्छी है।
    कृपया लिखना आप जारी रखे , साथ ही और बेहतर करने की कोशिश करे ।
    धन्यवाद
    आपके बेहतर भविष्य के लिए
    हार्दिक शुभकामनाएं 💐

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