‘माँ’ दिल छू जाने वाली एक शानदार रचना कुमारी कीर्ति अमृता आशा

कुछ तो सोचा होगा ईश्वर ने सृस्टि के सृजन को

यु ही नहीं बनाया होगा उन्होंने माँ को, 
जन्म देने धरा पे नये जीवन को ….
तमाम जिम्मेदारियों को निभाते निभाते, 
जो खुद को पीछे छोड़ देती है हाँ!!! 
वो एक माँ ही तो होती हैं ….
एक एक कौर खिलाते खिलाते 
जो भर पेट खिला देती है ,
हाँ वो एक माँ ही तो होती है ….
दोस्तों से भी सच्ची सहेली 
सुलझाने वाली जीवन की हर एक पहेली … 
यु ही नहीं हम संभल जाते है गिरते गिरते …. 
क्युकी होती पास माँ थामने को हाथ, 
जो कभी छोड़ती नहीं साथ…. 
हाँ वो एक माँ ही तो होती है…
जो बात बात पे डॉटना हो जाती है शुरू
हाँ!! माँ ही तो होती है जीवन की पहली गुरु ,
जो हर संभव कोशिश कर 
बच्चो की तक़दीर बनाती है 
हाँ वो एक माँ ही तो होती है ,जो 
खुद के सपनो को भूल कर 
पति परिवार और बच्चो के 
सपनो को  जो अपनाती है,और
जीवन के हर राह पर जो साथ निभाती है, 
हो चाहे उम्र के जिस भी पड़ाव पे माँ,
खुद से पहले परिवार की खुशियों को चाहती है.. 
जो हर रिश्तों को निस्वार्थ निभाती है.. 
जो सब से खास कहलाती है,
हाँ  वो एक माँ ही तो होती है । 
…………………(❁´◡`❁)…………………

कुमारी किर्ती अमृता आशा
 जमालपुर,(मुंगेर ) 
बिहार

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