मेरे तरफ देखो बस तन्हा और तनहाई है। अंकित


कैसी ये बेवफाई, कैसी ये
रुसवाई है,
मेरे तरफ देखो, बस तन्हा और
तनहाई है,
ना अपने,
अपने हो सके कभी,
देखे थे जो ख्वाब हम दोनों
ने..
ना पूरे हुए,
ना पूरे हो सकेंगे कभी.।
हम जुदा भी हुए ना जाने किस
बात पर
ना उन्हे पता, ना मुझे पता
चल सका कभी।
उनके दिए हर जख्म को दिल मे
दफन कर..
आज भी महफिलों में हर वक्त मुस्कुराते
हैं,पर
उनके जाने के बाद, खुल कर
मुस्कुरा ना सके कभी।
पता तो मुझे भी है…
ये इश्क मोहब्बत दिल दिल्लगी
और जिंदगी,
हर एक का आखिरी मुकाम तो है,
मिलना-बिछड़ना, रूठना-मानना,
हसना और हसाना,
जिंदगी इसी का तो नाम है, पर
हम ऐसे जुदा हो सकते हैं एक
दूजे से
ना यकीन हुआ ना ही यकीन
होगा कभी .।
ऐसा नहीं की हो कर जुदा
मुझे भूल जाएगी,
देखना मेरे बारे में सोच
तनहाई मे भी मुस्कुराएगी ..
हमने गुजारे हैं कुछ हसीन
पल एक दूजे के साथ,
जिसे ना हम, ना ही वो भुला सकती है कभी।
अब ना चाहत, ना ही नई ख्वाहिश
है कोई,
मेरे दिल में आज भी धड़कन बन
धड़कता है कोई
दिल में कुछ इस कदर बसी है
वो,
उसके सिवा ना कोई दिल में
आया, ना ही आएगा कभी ।

अंकित कुशवाहा 
ग़ाज़ीपुर (उत्तर -प्रदेश )

4 thoughts on “मेरे तरफ देखो बस तन्हा और तनहाई है। अंकित”

  1. Amazing poetry…..
    Kehte hai kayi baar pehla pyar galat insan se ho jata hai or dusri baar sahi insan se galat time pr ho jata hai …..

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