रोज मर्रा के काम से थक हार जब घर लौट आता है

रोज मर्रा के काम से 
थक हार जब घर लौट आता है,
भूख प्यास से निराश चेहरे
बच्चों का देख..
खुद निराश हो जाता है। 

एक पिता भी तो है यह सोच
दिलासा झूठी दे ,
बच्चों को फिर हँसता है।

अपने अनुभूति अपने कर्मों से 
हर किसी के सपने को
साकार बनाता है।

वो मजदूर  है साहब जो
हर किसी से प्यार जताता है।
बात जब देश की आये, तो..
अपना सब कुछ कुर्बान कर जाता है।

सच तो ये है कि वो,
जिल्लत भरी जिंदगी जीता है..
काम तो सब करवाते है, पर
हर कोई तनख्वाह कहां  देता है। 

मैंने देखा है करीब से
चहल कदमी सड़क पर भी 
घंटो एक रोटी के लिए
हर किसी के चरणों में गिड़गिड़ाता है।

मेरा सर शर्म से झुक जाता है, 
जब स्वाभिमानी समाज
उसको किनारे कर खुद
आगे निकल जाता है।

अंकित कुशवाहा 
ग़ाज़ीपुर (उत्तर -प्रदेश )

3 thoughts on “रोज मर्रा के काम से थक हार जब घर लौट आता है”

  1. Fabulous poetry Mr .Ankit 😊….yes ,only one person can sacrifices each and everything for the family, country etc…….keep it up buddy ❤️❤️

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